Lakshmi Ganesh Murti: दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की ऐसी मूर्ति लाना होता है अशुभ, खरीदने से पहले जान लें ये जरूरी नियम
दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति घर लाना पारम्परिक रूप से शुभ माना जाता है, परंतु कुछ डिजाइन, सामग्री और मुहूर्त संबंधी बातें दुर्भाग्य का संकेत भी मानी जाती हैं। कई समुदायों में मूर्ति की आकृति, उसकी नाक, आँखों की स्थिति, हाथों में वे जो आइटम पकड़े हैं और साथ ही मूर्ति के टूट-फूट या दरारें विशेष महत्व रखती हैं। कुछ आगम और गृहकर्म ग्रंथों में स्पष्ट निर्देश मिलते हैं कि किस प्रकार की बनावट और किस दिन मूर्ति को प्रतिष्ठापित करना चाहिए, जबकि स्थानीय परंपराएँ और वैरभिन्न्य व्याख्याएँ भी प्रचलित हैं। इस लेख में हम उन सामान्य नियमों और व्यावहारिक सुझावों को साम्प्रदायिक रूप से प्रस्तुत करेंगे जो खरीदने से पहले ध्यान रखने चाहिए, ताकि श्रद्धालु संतुलित और जानकारीपूर्ण निर्णय ले सकें। साथ ही हम बताएँगे कि दोषयुक्त मूर्ति की स्थिति में निवारण, प्रतिष्थापन या पारम्परिक तरीके से विसर्जन कब और कैसे करना चाहिए। यह निर्णय गुरु के साथ लें। सदैव।
क्यों कुछ मूर्तियाँ अशुभ मानी जाती हैं — ऐतिहासिक और विवेचनात्मक संदर्भ
पारम्परिक शिल्पशास्त्र और आगम ग्रंथों में मूर्ति निर्माण और प्रतिष्ठा के कई तकनीकी और प्रतीकात्मक नियम दिये गए हैं। इन ग्रंथों के अनुसार, मूर्ति में दोष केवल शिल्प कौशल की कमी नहीं, बल्कि इसके माध्यम से सम्प्रदायिक अर्थ और दिव्य उपस्थिति प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के लिए, आँखों की असामान्य स्थिति, चेहरे का विकृत भाव, हाथों में असंबद्ध धाराएँ या स्पष्ट दरारें लोक-विश्वास और धार्मिक परंपराओं में अशुभ संकेत मानी जाती हैं। वहीं अन्य विद्वानों और स्थानीय परंपराओं का कहना है कि उत्सव-भाव और श्रद्धा ही अधिक महत्त्वपूर्ण है; इसलिए व्याख्याओं में भिन्नता कदाचित स्वीकृत है।
कौन-सी खास त्रुटियाँ खरीदने पर सतर्क करती हैं
- स्पष्ट दरारें या चिप्स: मूर्ति में दरारें, टूटे हुए अंग या नाक की क्षति सामान्यत: नकारात्मक मानी जाती हैं।
- चेहरे का विकृत भाव: भयावह रुख, आँखों का असामान्य अभिव्यंजकता—यह पारंपरिक रूप से अनुकूल नहीं माना जाता।
- गणेश की नियमिक विशेषताएँ नहीं: जैसे एक दांत टूटा होना, मोदक के बजाय अन्य वस्तु पकड़े होना—ऐतिहासिक निर्देशों से मेल नहीं खाता।
- त्रिकालिक (दाहिना मुंह) वाम/दक्षिण वर्चस्व के संकेत: कुछ परंपराओं में गणेश का दाहिना-मोड़ीय (दक्षिणमुखी) तिर्यक ट्रंक विशेष तप या अनुष्ठान की मांग करता है; घरेलू पूजा के लिए वाममुखी अधिक सामान्य और सहज माना जाता है।
- पहले से पूजा की हुई मूर्ति: यदि विक्रेता ने पहले ही मूर्ति की पूजा कर ली हो तो उसे हटाना/निरस्त करना अलग धार्मिक विचार मांग सकता है—पंडित से परामर्श उपयोगी होगा।
सामग्री का चयन — अस्थायी बनाम स्थायी मूर्ति
दीवाली के लिए मिट्टी की (कुंकुम/स्थानीय क्ले) मूर्तियाँ पारम्परिक और पारिस्थितिक दृष्टि से उपयुक्त मानी जाती हैं, खासकर यदि उन्हें बाद में विसर्जित किया जाना हो। स्थायी प्रतिष्ठा के लिए ताँबा/पीतल/पंचलोह जैसे धातु उपयोग किए जाते हैं और आगम में इन्हें महत्व दिया गया है। राल या पॉलिस्टर जैसी आधुनिक सामग्रियाँ बाजार में सस्ते विकल्प देती हैं, पर पारम्परिक निर्देशों के अनुरूप इनका दर्जा विविध सामुदायिक राय पर निर्भर करता है। खरीदने से पहले मतभेद जान लें और यदि घर पर दीर्घकालिक प्रतिष्ठा है तो पंडित से सलाह लेकर उपयुक्त सामग्री चुनें।
मुहूर्त और स्थापना से जुड़ी सावधानियाँ
- कई समुदायों में धनत्रयोदशी (धनतेरस) पर खरीद-फरोख्त को शुभ माना जाता है; पर मूर्ति की प्रतिष्ठा अक्सर लक्ष्मी पूजा या दीवाली की रात में की जाती है—स्थानीय पंचांग व पुजारी से मिलकर तिथि तय करें।
- यदि मूर्ति नया खरीदी गई है, तो उसे प्रतिष्ठित करने से पहले शुद्धिकरण क्रियाएँ, अभिषेक और संकल्प करना शुभ माना जाता है।
- दाँया मुखी गणेश (दक्षिणमुखी) के मामलों में कुछ आगम विशेष नियम रखते हैं—ऐसी मूर्ति घर पर स्थापित करने से पहले विशेष अनुष्ठान और लगातार पूजन आवश्यक हो सकता है।
खरीदने से पहले व्यावहारिक चेकलिस्ट
- मूर्ति के चेहरे और अंग ठीक हैं या नहीं—दरार, चिप, असमान आँखें न हों।
- आइकॉनोग्राफिक मेल—लक्ष्मी के हाथों में कमल और मुद्रा, गणेश के हाथ में मोदक, तृण आदि।
- मूर्ति पहले से पूजा गई है या नहीं—यदि हाँ तो उसके निस्तारण संबंधी नियम पूछ लें।
- सामग्री और आकार—घर के स्थान, विसर्जन-सुविधा और दीर्घस्थायी प्रतिष्ठा के हिसाब से सोचें।
- विक्रेता से रसीद और स्रोत पूछें—चोरी या अवैध उत्खनन से बनी मूर्तियाँ समस्याग्रस्त हो सकती हैं।
यदि गलती से दोषयुक्त मूर्ति खरीद ली गई—उपाय
पहला विकल्प है वापसी या बदलाव। यदि यह संभव नहीं है तो पंडित या समुदायिक मार्गदर्शक से परामर्श लें। कई परंपराएँ दोषयुक्त मूर्ति पर शुद्धिकरण, हवन या विशेष सन्ध्यान कर के उसे उपयोगी मान लेती हैं; अन्यथा पारंपरिक तरीके से सम्मानपूर्वक विसर्जन या भूमि-समर्पण सुझाया जाता है। किसी भी निर्णय से पहले स्थानीय गुरु या पुरोहित की सलाह लेना सामर्थ्यपूर्ण और सामुदायिक रूप से संवेदनशील कदम है।
निष्कर्ष
लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति खरीदते समय तकनीकी शिल्प-मानक, सामग्री, मुहूर्त और सामुदायिक परंपराओं का संतुलन आवश्यक है। एक सामान्य नियम यह है: पारंपरिक निर्देशों का सम्मान करें, पर स्थानीय प्रथाओं और पंडितों की सलाह को महत्व दें। यदि किसी मूर्ति में दोष दिखे तोैनिक विकल्प — वापसी, शुद्धिकरण या सम्मानजनक निवारण — में से समुदाय और गुरु के साथ परामर्श कर निर्णय लें। इस तरह श्रद्धा और विवेक दोनों का संतुलन बना रहता है।